माँ की याद में

28 मई 2021

पत्नी की आवाज़ में, उनकी माँ के लिए लिखी गई, और अंतिम संस्कार में पढ़ी गई।

कोई सुबह ऐसी नहीं कि तूने नींद से मुझे जगाया नहीं था
कोई शाम बीती नहीं कि हमने हाल दिल का बताया नहीं था

खाने की बातें, यादों के किस्से, सपनों के चर्चे सब खिलखिलाते
वो चाय की प्याली में बिस्कुट डुबा के, हाथ तेरे थे यूँ थरथराते
अधर पे तेरे लतीफ़ों की लय और कुछ रवानी अलग थी
थके तेरी बातों से हम कब, इतना तो तूने सताया नहीं था

कोई सुबह ऐसी नहीं कि तूने नींद से मुझे जगाया नहीं था
कोई शाम बीती नहीं कि हमने हाल दिल का बताया नहीं था

कुछ सुबहें बची थीं, उन शामों के आगे रात होकर गुज़रतीं
बीज बोए थे मैंने आँगन में तेरे, संग मेरे तू सजती सँवरती
आँचल में तेरे वो सर रख के सोते, रोते कभी और कभी यूँ ही हँसते
अब अकेले चलूँ रस्तों पे निडर, इतना तो तूने सिखाया नहीं था

कोई सुबह ऐसी नहीं कि तूने नींद से मुझे जगाया नहीं था
कोई शाम बीती नहीं कि हमने हाल दिल का बताया नहीं था

वो ज़िंदादिली तेरी मेरे अंदर भी है माँ
मुझमें तेरी हँसी का समंदर भी है माँ
रख लूँगी ख़याल तेरे बाद मैं सबका
देती हूँ भरोसा, ये पहले गर जताया नहीं था

कोई सुबह ऐसी नहीं कि तूने नींद से मुझे जगाया नहीं था
कोई शाम बीती नहीं कि हमने हाल दिल का बताया नहीं था

दिया जो तूने था मुझे याद वो संस्कार है
आए शिकायत ससुराल से, वो तेरा तिरस्कार है
भूली नहीं कभी कि ये भी मेरा ही परिवार है
सीखों को तेरी, माँ, मैंने कभी यूँ दफ़नाया नहीं था

कोई सुबह ऐसी नहीं कि तूने नींद से मुझे जगाया नहीं था
कोई शाम बीती नहीं कि हमने हाल दिल का बताया नहीं था

गई जब तू फ़लक पे सितारा यूँ बनकर
मैं भी बेटी तेरी हूँ, और ये कहती हूँ ठनकर
तू सहेली थी मेरी सब सहेलियों से बढ़कर
सुन ले अभी गर पहले मैंने बताया नहीं था

कोई सुबह ऐसी नहीं कि तूने नींद से मुझे जगाया नहीं था
कोई शाम बीती नहीं कि हमने हाल दिल का बताया नहीं था

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