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A mood painting for
Poem

खिली हुई हरी घास

28 मई 2021

फूल बिखरे थे, पर पौधे फिर से खड़े हो गए — पत्नी के लिए, एक कठिन समय में लिखी गई।

खिली हुई हरी घास, फूल बिखरे पड़े थे हवाओं का ज़ोर, पौधे फिर भी खड़े थे
मेरे बसेरे की बहारों को छू सकता नहीं कोई वो खिलने को फिर से, इस धुन पे अड़े थे
पतझड़ का मौसम कभी ठहरता नहीं है वह रहता सलामत जो बिखरता नहीं है
सुर वो कोयल के, सवेरा नया था चले पाँव गीले, ओस में भीगा था साँसें नयी थीं, लहराते फूल थे लबों पे ख़ुशी थी, हँसी से सजा था
पतझड़ का मौसम कभी ठहरता नहीं है वह रहता सलामत जो बिखरता नहीं है
अता कर उसे जो आज लड़खड़ाए शामों में उसकी जुगनू जगमगाएँ हँसी में उसकी अब रख तू वही धुन हँसता है वो तो जग झिलमिलाए
हर सूनी कोख को फिर भरता तू ही है वह रहता सलामत जो बिखरता नहीं है

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